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RTI में सूचना छिपाई या गलत दी? अब FIR तक पहुंचेगा मामला, जानिए PIO के खिलाफ कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया

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Posted by WHRRC | August 31, 2026

जानकारी नहीं मिली तो केवल अपील ही रास्ता नहीं—जानिए कब RTI मामले में FIR की मांग की जा सकती है और नागरिक को क्या-क्या कदम उठाने चाहिए

क्या आपने RTI आवेदन किया, लेकिन निर्धारित समय में कोई जवाब नहीं मिला?
क्या लोक सूचना अधिकारी (PIO) ने सूचना देने से इनकार कर दिया? क्या आधी-अधूरी या भ्रामक जानकारी दी गई? क्या ऐसी जानकारी दी गई जो सरकारी रिकॉर्ड से ही झूठी साबित होती है? या आपको आशंका है कि RTI आवेदन के बाद रिकॉर्ड में बदलाव, छेड़छाड़ अथवा कूटरचना की गई?

ऐसी स्थिति में अधिकांश नागरिक केवल प्रथम अपील और द्वितीय अपील तक सीमित रह जाते हैं। लेकिन हर मामले में स्थिति इतनी सरल नहीं होती।

RTI Act स्वयं शिकायत, अपील और PIO पर दंड की व्यवस्था करता है। इसके अतिरिक्त, यदि अधिकारी का आचरण किसी स्वतंत्र आपराधिक अपराध के आवश्यक तत्वों को पूरा करता है, तो वर्तमान आपराधिक कानून के तहत FIR या आपराधिक जांच की मांग भी की जा सकती है।

हालाँकि एक महत्वपूर्ण कानूनी सावधानी जरूरी है—

RTI Act का प्रत्येक उल्लंघन अपने आप में FIR का अपराध नहीं है। FIR तभी उचित होगी जब उपलब्ध तथ्यों से किसी संज्ञेय अपराध के आवश्यक तत्व सामने आते हों।

इसलिए नागरिक को केवल धाराओं की लंबी सूची देने के बजाय घटना, प्रमाण, अपराध के तत्व और FIR की प्रक्रिया को समझना चाहिए।


1. सबसे पहले समझिए—RTI में सूचना न मिलने पर कौन-से अधिकार हैं?

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नागरिक को सार्वजनिक प्राधिकरण के नियंत्रण में उपलब्ध सूचना प्राप्त करने का अधिकार देता है।

यदि PIO:

  • समय सीमा में जवाब नहीं देता;

  • सूचना देने से मना करता है;

  • अधूरी सूचना देता है;

  • misleading information देता है;

  • false information देता है;

  • या सूचना प्राप्त करने में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है,

तो RTI Act की धारा 18 के तहत सूचना आयोग के समक्ष शिकायत की जा सकती है। धारा 18 में विशेष रूप से उस स्थिति को शामिल किया गया है जब आवेदक को समय सीमा में जवाब नहीं मिला हो अथवा उसे incomplete, misleading या false information दी गई हो।

इसके अतिरिक्त RTI Act की धारा 19 के तहत प्रथम और द्वितीय अपील का रास्ता उपलब्ध है।

वहीं धारा 20 के अंतर्गत, निर्धारित परिस्थितियों में सूचना आयोग PIO पर monetary penalty लगा सकता है।

इसलिए पहला कदम हमेशा अपने RTI अधिकारों को व्यवस्थित रूप से प्रयोग करना होना चाहिए।


2. क्या RTI में सूचना न देने पर सीधे FIR हो सकती है?

सीधे और स्वतः नहीं।

यह समझना बहुत आवश्यक है कि:

“RTI का उल्लंघन” और “आपराधिक अपराध” दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।

उदाहरण के लिए, यदि PIO ने गलती से समय सीमा में जवाब नहीं दिया, तो केवल इस आधार पर किसी गंभीर आपराधिक धारा में FIR स्वतः नहीं हो जाती।

लेकिन यदि प्रमाण से यह सामने आता है कि अधिकारी ने:

  • जानबूझकर कानून की अवहेलना की;

  • गलत दस्तावेज तैयार किया;

  • सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर की;

  • कूटरचित दस्तावेज तैयार या इस्तेमाल किया;

  • किसी को धोखा देने का आपराधिक कृत्य किया;

  • रिकॉर्ड नष्ट या छिपाया;

  • या आवेदक को आपराधिक धमकी दी,

तो RTI कार्रवाई के साथ-साथ संबंधित आपराधिक अपराध की शिकायत की जा सकती है।


3. वर्तमान कानून में IPC नहीं, BNS और CrPC नहीं, BNSS

यह जानकारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

1 जुलाई 2024 से भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) ने IPC का स्थान लिया है और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) ने आपराधिक प्रक्रिया के पुराने CrPC का स्थान लिया है।

इसलिए 2026 में किसी नए मामले के संबंध में पुराने लेखों में दी गई IPC धाराओं को ज्यों का त्यों FIR में लिखना उचित नहीं है।

RTI से संबंधित आपराधिक शिकायत तैयार करते समय वर्तमान BNS और BNSS के प्रावधानों को ध्यान में रखना चाहिए।


4. PIO द्वारा कानून का जानबूझकर उल्लंघन—BNS धारा 198

वर्तमान BNS की धारा 198 ऐसे लोक सेवक के संबंध में है जो कानून के निर्देश की जानबूझकर अवज्ञा करता है और ऐसा करते समय किसी व्यक्ति को injury पहुँचाने का आशय रखता है या जानता है कि इससे injury होने की संभावना है। इस धारा में एक वर्ष तक का साधारण कारावास, या जुर्माना, या दोनों का प्रावधान है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक RTI delay पर धारा 198 स्वतः लग जाएगी।

शिकायत में यह दिखाना आवश्यक होगा कि:

कानूनी दायित्व + जानबूझकर अवज्ञा + injury का आवश्यक तत्व

मौजूद है।


5. गलत सरकारी दस्तावेज तैयार करने पर BNS धारा 201

यदि कोई लोक सेवक किसी दस्तावेज या electronic record को तैयार करने के लिए विधि द्वारा जिम्मेदार है और वह जानबूझकर ऐसा document/record तैयार करता है जिसे वह गलत जानता है या गलत मानता है, तथा उससे किसी व्यक्ति को injury पहुँचाने का आशय या संभावना है, तो BNS धारा 201 प्रासंगिक हो सकती है।

इस धारा में तीन वर्ष तक के कारावास, जुर्माने या दोनों का प्रावधान है।

यह प्रावधान RTI मामलों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है जहाँ मामला केवल “सूचना नहीं दी” तक सीमित न होकर गलत सरकारी दस्तावेज तैयार करने तक पहुँचता हो।


6. सरकारी रिकॉर्ड में कूटरचना होने पर BNS धारा 336 और 337

यदि कोई व्यक्ति किसी दस्तावेज या electronic record को इस उद्देश्य से false बनाता है कि किसी व्यक्ति या जनता को injury हो, कोई fraud किया जाए अथवा कोई गलत claim स्थापित किया जाए, तो BNS धारा 336 के अंतर्गत forgery का प्रश्न उठ सकता है।

इसके अतिरिक्त, सरकारी रिकॉर्ड या public servant के official document आदि की forgery से संबंधित परिस्थितियों में BNS धारा 337 भी प्रासंगिक हो सकती है।

इसलिए यदि RTI आवेदक के पास:

  • मूल रिकॉर्ड,

  • RTI में दिया गया रिकॉर्ड,

  • दोनों दस्तावेजों की तुलना,

  • certified copies,

  • electronic metadata या अन्य विश्वसनीय प्रमाण

मौजूद हैं, तो शिकायत में इनका स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिए।


7. कूटरचित दस्तावेज को असली बताकर इस्तेमाल करना—BNS धारा 340

सिर्फ document बनाना ही नहीं, बल्कि यह जानते हुए कि document forged है, उसे वास्तविक document के रूप में इस्तेमाल करना भी अपराध हो सकता है।

BNS धारा 340 forged document या electronic record को genuine के रूप में उपयोग करने से संबंधित है।

इसलिए यदि किसी सरकारी विभाग में RTI के जवाब के साथ ऐसा document दिया जाता है जो प्रमाण के आधार पर forged दिखाई देता है, तो शिकायत में यह मांग की जा सकती है कि:

मूल रिकॉर्ड सुरक्षित किया जाए, दोनों रिकॉर्ड की जांच की जाए और यदि forgery के तत्व पाए जाएँ तो संबंधित BNS धाराओं में FIR दर्ज कर जांच की जाए।


8. Cheating के मामले में BNS धारा 318

पुरानी IPC की धारा 420 के स्थान पर वर्तमान BNS में cheating से संबंधित प्रमुख प्रावधान धारा 318 में हैं।

लेकिन केवल गलत RTI जवाब मिलने से cheating स्वतः सिद्ध नहीं होती।

Cheating के लिए deception और कानून में निर्धारित अन्य आवश्यक तत्वों का होना जरूरी है।

इसलिए शिकायत में केवल यह लिखना पर्याप्त नहीं है कि:

“PIO ने गलत जानकारी दी इसलिए BNS 318 लगा दी जाए।”

बल्कि यह स्पष्ट करना चाहिए कि:

  • किस प्रकार deception किया गया;

  • आरोपी का क्या dishonest/fraudulent intent था;

  • किस व्यक्ति को किस प्रकार नुकसान हुआ;

  • और उपलब्ध दस्तावेज किस प्रकार इस अपराध के तत्वों को दर्शाते हैं।


9. शुल्क लेने के बाद सूचना न देने पर क्या FIR होगी?

RTI fee जमा करना और सूचना न मिलना अपने आप में criminal breach of trust या cheating नहीं बनता।

यदि केवल RTI शुल्क जमा हुआ और सूचना नहीं मिली, तो पहले RTI Act के तहत शिकायत/अपील और धारा 20 के उपायों का उपयोग किया जाना चाहिए।

लेकिन यदि किसी अलग घटना में धन/संपत्ति के संबंध में criminal breach of trust या cheating के आवश्यक तत्व मौजूद हों, तो संबंधित BNS provisions की जांच की जा सकती है।

इसलिए इस स्थिति में BNS धारा 316 और 318 जैसे प्रावधान तथ्यों के आधार पर विचार योग्य हो सकते हैं—लेकिन इन्हें स्वतः लागू मानना उचित नहीं होगा।


10. PIO या FAA द्वारा धमकी देने पर BNS धारा 351

RTI आवेदन करने के बाद यदि अधिकारी आवेदक को धमकी देता है और धमकी का उद्देश्य उसे डराना या उसके वैध अधिकार के प्रयोग से रोकना है, तो मामला गंभीर हो सकता है।

वर्तमान BNS की धारा 351 criminal intimidation से संबंधित है। इसमें व्यक्ति, प्रतिष्ठा या संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की धमकी देकर alarm पैदा करने अथवा किसी व्यक्ति को ऐसा कार्य करने/न करने के लिए मजबूर करने की स्थिति शामिल है।

यदि धमकी:

  • फोन पर,

  • WhatsApp पर,

  • SMS से,

  • ई-मेल से,

  • आमने-सामने,

  • या किसी अन्य माध्यम से

दी गई है, तो उपलब्ध साक्ष्य सुरक्षित रखें।


11. First Appellate Authority के विरुद्ध क्या करें?

यदि प्रथम अपीलीय अधिकारी (FAA) के समक्ष प्रथम अपील लंबित है और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार निर्णय नहीं किया जाता, तो आवेदक के पास RTI Act के तहत आगे की अपील/शिकायत का अधिकार रहता है।

लेकिन FAA द्वारा निर्णय न करना अपने आप में किसी विशेष BNS धारा का स्वतः अपराध नहीं बन जाता।

यदि FAA के आचरण में अलग से:

  • जानबूझकर गलत दस्तावेज तैयार करना;

  • रिकॉर्ड में हेरफेर;

  • आपराधिक धमकी;

  • धोखाधड़ी;

  • या अन्य संज्ञेय अपराध

के आवश्यक तत्व मौजूद हैं, तो उन्हीं तथ्यों के आधार पर आपराधिक शिकायत की जा सकती है।


12. अब सबसे महत्वपूर्ण—FIR दर्ज कराने की पूरी प्रक्रिया

यदि आपको लगता है कि RTI मामले में स्वतंत्र संज्ञेय अपराध हुआ है, तो नागरिक निम्न प्रक्रिया अपना सकता है।

चरण 1 — सभी प्रमाण सुरक्षित करें

सबसे पहले पूरा रिकॉर्ड तैयार करें:

  • RTI application;

  • application number;

  • postal receipt/online receipt;

  • RTI fee proof;

  • PIO का उत्तर;

  • उत्तर मिलने की तारीख;

  • प्रथम अपील;

  • FAA का आदेश/उत्तर;

  • द्वितीय अपील/शिकायत;

  • संबंधित सरकारी रिकॉर्ड;

  • गलत सूचना को गलत साबित करने वाले documents;

  • electronic records;

  • photographs/videos;

  • धमकी के messages;

  • अन्य संबंधित evidence।


चरण 2 — एक Evidence Comparison तैयार करें

यदि आपका आरोप “गलत सूचना” का है तो सबसे प्रभावी तरीका है:

RTI में मांगी गई सूचना PIO का उत्तर वास्तविक रिकॉर्ड विरोधाभास/अपराध का आधार
आदेश की प्रति आदेश उपलब्ध नहीं विभागीय रिकॉर्ड में आदेश मौजूद गलत सूचना
भुगतान विवरण भुगतान नहीं हुआ सरकारी खाते में भुगतान दर्ज रिकॉर्ड-विरोधी सूचना
फाइल की स्थिति फाइल उपलब्ध नहीं File movement record उपलब्ध रिकॉर्ड छिपाने की आशंका

ऐसी तुलना पुलिस और सूचना आयोग दोनों के सामने मामले को समझने में मदद करती है।


13. पुलिस थाने में शिकायत कैसे दें?

यदि आपको लगता है कि संज्ञेय अपराध बनता है, तो BNSS धारा 173 के तहत पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी को अपराध की सूचना दी जा सकती है।

BNSS धारा 173 के अनुसार संज्ञेय अपराध की सूचना मौखिक या electronic communication से भी दी जा सकती है; लिखित सूचना को रिकॉर्ड किया जाना चाहिए।

शिकायत में केवल “RTI का जवाब नहीं मिला” न लिखें।

बल्कि लिखें:

घटना → आरोपी अधिकारी → कानूनी कर्तव्य → जानबूझकर किया गया कृत्य → उपलब्ध प्रमाण → बनने वाला संज्ञेय अपराध → FIR की मांग।


14. FIR दर्ज न हो तो अगला कदम क्या है?

यदि पुलिस थाना शिकायत लेने या FIR दर्ज करने से इनकार करता है, तो नागरिक के लिए BNSS धारा 173(4) महत्वपूर्ण है।

इस प्रावधान के अनुसार पुलिस थाने द्वारा सूचना दर्ज करने से इनकार होने पर शिकायतकर्ता उस सूचना का सार लिखित रूप में डाक द्वारा संबंधित Superintendent of Police (SP) को भेज सकता है। यदि SP को संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो वह स्वयं जांच कर सकता है या अधीनस्थ पुलिस अधिकारी से जांच कराने का निर्देश दे सकता है।

इसलिए प्रक्रिया इस प्रकार रखें:

थाना → SP → Magistrate

यदि पुलिस स्तर पर कार्रवाई नहीं होती, तो उपलब्ध वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार मजिस्ट्रेट के समक्ष उचित आवेदन किया जा सकता है। BNSS धारा 175(3) में Magistrate द्वारा investigation का आदेश देने की व्यवस्था दी गई है।


15. FIR की शिकायत में कौन-कौन से दस्तावेज लगाएं?

एक मजबूत शिकायत के साथ निम्न दस्तावेजों की सूची लगाना उपयोगी है:

Annexure–1

RTI Application की प्रति

Annexure–2

RTI fee/payment proof

Annexure–3

PIO का उत्तर अथवा जवाब न मिलने का प्रमाण

Annexure–4

First Appeal की प्रति

Annexure–5

FAA का आदेश/उत्तर

Annexure–6

वह सरकारी रिकॉर्ड जिससे PIO की सूचना गलत साबित होती है

Annexure–7

दस्तावेजों की तुलना

Annexure–8

Electronic evidence

Annexure–9

धमकी/अन्य आपराधिक कृत्य का प्रमाण

Annexure–10

पूर्व में पुलिस/विभाग/सूचना आयोग को की गई शिकायतों की प्रतियां


16. FIR आवेदन में धाराओं की सूची कैसे लिखें?

नागरिक को यह नहीं लिखना चाहिए कि:

“मेरे हिसाब से सभी धाराएँ लगा दी जाएँ।”

इसके बजाय अधिक कानूनी रूप से उचित भाषा होगी:

“उपरोक्त तथ्यों एवं संलग्न साक्ष्यों से यदि कोई संज्ञेय अपराध बनता है, तो संबंधित धाराओं के अंतर्गत FIR दर्ज कर निष्पक्ष जांच की जाए तथा जांच के दौरान सामने आने वाले अन्य अपराधों में भी विधि के अनुसार कार्रवाई की जाए।”

इससे शिकायतकर्ता पुलिस को अपराध के तथ्य और प्रमाण देता है, जबकि अंतिम धाराओं का निर्धारण जांच के आधार पर किया जा सकता है।


17. RTI Act और FIR—दोनों कार्रवाई साथ चल सकती हैं

नागरिक को यह भ्रम नहीं रखना चाहिए कि यदि FIR की मांग कर दी तो RTI appeal बंद हो जाएगी।

दोनों के उद्देश्य अलग हैं।

RTI प्रक्रिया

RTI Application → First Appeal → Second Appeal/Complaint → Information Commission → Information/RTI Penalty

आपराधिक प्रक्रिया

Criminal Complaint → Police → FIR/Investigation → Final Report/Charge-sheet → Court

इसलिए परिस्थितियों के अनुसार दोनों कानूनी रास्ते अलग-अलग उद्देश्य से अपनाए जा सकते हैं।


18. नागरिक के लिए सम्पूर्ण Action Plan

यदि RTI में गंभीर अनियमितता सामने आती है, तो यह क्रम अपनाएँ:

STEP 1

RTI आवेदन करें।

STEP 2

समय सीमा समाप्त होने तक प्रतीक्षा करें।

STEP 3

जवाब न मिले तो First Appeal करें।

STEP 4

गलत/अधूरी/भ्रामक सूचना हो तो उसका documentary comparison तैयार करें।

STEP 5

RTI Act की धारा 18/19 के तहत उपलब्ध शिकायत/अपील का उपयोग करें।

STEP 6

PIO की culpable conduct के लिए RTI Act की धारा 20 के तहत penalty की मांग करें।

STEP 7

यदि स्वतंत्र संज्ञेय अपराध के प्रमाण हों, तो BNSS धारा 173 के तहत पुलिस को शिकायत दें।

STEP 8

FIR दर्ज न होने पर BNSS धारा 173(4) के तहत SP को शिकायत भेजें।

STEP 9

फिर भी कार्रवाई न हो तो BNSS के तहत सक्षम Magistrate के समक्ष उचित आवेदन का विकल्प अपनाएँ।

STEP 10

सभी documents, receipts, acknowledgements और correspondence सुरक्षित रखें।


19. कौन-सी स्थिति में मामला अधिक गंभीर हो सकता है?

स्थिति संभावित कानूनी रास्ता
समय पर RTI जवाब नहीं मिला RTI Appeal/Complaint
अधूरी सूचना मिली RTI Appeal/Complaint
misleading/false information RTI Act + तथ्य के अनुसार आपराधिक शिकायत
जानबूझकर गलत सरकारी document तैयार किया BNS 201 पर विचार
सरकारी रिकॉर्ड की forgery BNS 336/337 पर विचार
forged document/e-record को genuine बताकर इस्तेमाल किया BNS 340 पर विचार
deception/cheating के आवश्यक तत्व मौजूद BNS 318 पर विचार
कानून की जानबूझकर अवहेलना और injury का आवश्यक तत्व BNS 198 पर विचार
RTI के कारण आपराधिक धमकी BNS 351 पर विचार
थाना FIR दर्ज न करे BNSS 173(4) → SP
SP स्तर पर भी कार्रवाई न हो BNSS के तहत Magistrate का वैधानिक उपाय

ध्यान दें: तालिका में दिए गए BNS sections परिस्थितियों के आधार पर संभावित प्रावधान हैं; इन्हें हर RTI मामले में स्वतः लागू नहीं माना जा सकता। BNS में धारा 198 public servant द्वारा law disobey करने के साथ injury के आवश्यक तत्व से संबंधित है, धारा 201 incorrect document तैयार करने से, धारा 336 forgery से, धारा 340 forged document/electronic record के उपयोग से और धारा 351 criminal intimidation से संबंधित है।


20. सबसे जरूरी सावधानी

किसी अधिकारी पर केवल दबाव बनाने के लिए FIR की मांग न करें।

शिकायत में वही आरोप लगाएँ जिनके समर्थन में आपके पास प्रमाण हों।

उदाहरण के लिए:

गलत सूचना और कूटरचित दस्तावेज अलग-अलग आरोप हैं।

RTI में देरी और जानबूझकर कानून की अवहेलना कर injury पहुँचाना अलग-अलग कानूनी स्थितियाँ हैं।

शुल्क जमा करना और criminal breach of trust भी स्वतः एक ही बात नहीं हैं।

इसलिए धाराएँ तथ्यों के अनुसार चुनना आवश्यक है।


निष्कर्ष: RTI को केवल सूचना प्राप्त करने का साधन नहीं, जवाबदेही का माध्यम बनाइए

सूचना का अधिकार नागरिक को शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का शक्तिशाली माध्यम देता है।

यदि PIO समय पर सूचना नहीं देता, तो RTI Act में शिकायत, अपील और दंड की व्यवस्था है। यदि सूचना अधूरी, misleading या false है, तो भी RTI Act की धारा 18 के अंतर्गत शिकायत का स्पष्ट आधार उपलब्ध है।

लेकिन यदि उपलब्ध प्रमाण यह संकेत देते हैं कि मामला केवल RTI की administrative lapse तक सीमित नहीं है और अधिकारी ने जानबूझकर कानून की अवहेलना, गलत सरकारी document तैयार करने, forgery, forged record के उपयोग, cheating या criminal intimidation जैसा स्वतंत्र अपराध किया है, तो नागरिक वर्तमान BNS के तहत आपराधिक कार्रवाई की मांग कर सकता है।

और यदि संज्ञेय अपराध की सूचना देने के बाद पुलिस FIR दर्ज नहीं करती, तो BNSS धारा 173(4) के तहत SP को शिकायत और उसके बाद उपलब्ध न्यायिक उपाय अपनाए जा सकते हैं।

याद रखिए:

“RTI में सूचना न मिलना एक समस्या है; लेकिन यदि सूचना छिपाने के पीछे आपराधिक कृत्य का प्रमाण है, तो नागरिक के पास केवल अपील ही नहीं—कानून के अनुसार आपराधिक कार्रवाई की मांग का रास्ता भी हो सकता है।”

अपने अधिकार जानिए। प्रमाण सुरक्षित रखिए। RTI Act का उपयोग कीजिए और जहाँ स्वतंत्र आपराधिक अपराध बनता हो, वहाँ BNS और BNSS के तहत उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया अपनाइए।



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