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उज्जैन के चक्रतीर्थ श्मशान घाट में शव के साथ कथित अमानवीय व्यवहार की घटना पर WHRRC ने लिया संज्ञान, पुलिस से विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट मांगी

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Posted by WHRRC | September 01, 2026

उज्जैन, मध्य प्रदेश। विश्व मानवाधिकार अनुसंधान परिषद् (WHRRC) ने उज्जैन स्थित चक्रतीर्थ श्मशान घाट से संबंधित एक अत्यंत गंभीर एवं चिंताजनक घटना का मानवाधिकार एवं मानव गरिमा के दृष्टिकोण से अनुसंधानात्मक संज्ञान लिया है। विभिन्न सार्वजनिक माध्यमों एवं समाचार रिपोर्टों में सामने आई जानकारी के अनुसार, एक व्यक्ति द्वारा कथित रूप से जलती हुई चिता से मृत मानव शरीर का अंश निकालकर उसका सेवन किए जाने का वीडियो प्रसारित हुआ है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, घटना के संबंध में पुलिस द्वारा प्रकरण दर्ज किए जाने तथा संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।

WHRRC ने स्पष्ट किया है कि परिषद् का संज्ञान किसी व्यक्ति की किन्नर/ट्रांसजेंडर पहचान, धार्मिक पहचान, अघोरी परंपरा अथवा किसी विशेष सामाजिक या आध्यात्मिक समुदाय के आधार पर नहीं है। परिषद् की चिंता केवल उस कथित कृत्य से संबंधित है, जिसमें मृत मानव शरीर अथवा उसके अंश के साथ कथित रूप से ऐसा व्यवहार किए जाने की बात सामने आई है। यदि जांच में घटना की पुष्टि होती है, तो यह मृतक की गरिमा, शव के सम्मान, कानून के शासन तथा सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित गंभीर प्रश्न उत्पन्न करता है।

परिषद् का मानना है कि मानव गरिमा केवल जीवित व्यक्ति तक सीमित अवधारणा नहीं है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसके शरीर एवं मानव अवशेषों के साथ सम्मानजनक व्यवहार भी मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मृत व्यक्ति अपने शरीर की स्वयं रक्षा करने की स्थिति में नहीं होता; इसलिए शव की सुरक्षा, सम्मानजनक हैंडलिंग तथा अंतिम संस्कार की गरिमा सुनिश्चित करना प्रशासनिक एवं संस्थागत व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में अनुच्छेद 21 जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण का प्रमुख आधार है तथा न्यायिक दृष्टिकोण में मानव गरिमा को इस संवैधानिक संरक्षण का अभिन्न हिस्सा माना गया है। मृत शरीर के सम्मानजनक व्यवहार एवं अंतिम संस्कार की गरिमा से जुड़े न्यायिक सिद्धांत भी इसी व्यापक मानव गरिमा की अवधारणा से संबंधित हैं। इसलिए WHRRC के अनुसार इस घटना को केवल कानून-व्यवस्था की सामान्य घटना के रूप में नहीं, बल्कि मृत मानव शरीर की गरिमा एवं सम्मान के संवैधानिक और मानवाधिकार पक्ष से भी देखा जाना आवश्यक है।

घटना के कानूनी पक्ष पर परिषद् ने कहा है कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 301 अंतिम संस्कार के स्थान तथा मानव शव के साथ अपमान से संबंधित कृत्यों के संदर्भ में प्रासंगिक हो सकती है। हालांकि, किसी भी कानूनी प्रावधान की वास्तविक प्रयोज्यता घटना के प्रमाणित तथ्यों एवं जांच में सामने आने वाले साक्ष्यों पर निर्भर करती है। इसलिए पुलिस द्वारा घटना के समस्त तथ्यों का निष्पक्ष परीक्षण करते हुए धारा 301 सहित घटना के अनुरूप लागू होने वाले अन्य प्रासंगिक कानूनी प्रावधानों की भी जांच की जानी चाहिए।

WHRRC ने इस घटना को Universal Declaration of Human Rights (UDHR) में निहित मानव गरिमा, समानता, सुरक्षा और प्रभावी कानूनी संरक्षण के व्यापक सिद्धांतों से भी संबंधित माना है। UDHR का Article 1 समान गरिमा एवं अधिकारों की अवधारणा को स्वीकार करता है, जबकि Articles 3, 5, 7 और 8 क्रमशः व्यक्ति की सुरक्षा, अमानवीय अथवा अपमानजनक व्यवहार से संरक्षण, कानून के समक्ष समानता तथा प्रभावी कानूनी उपचार के सिद्धांतों को रेखांकित करते हैं।

परिषद् के अनुसार, घटना की जांच वैज्ञानिक एवं साक्ष्य-आधारित तरीके से किया जाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि घटना से संबंधित वीडियो या अन्य डिजिटल सामग्री उपलब्ध है, तो उसकी प्रामाणिकता, स्रोत, रिकॉर्डिंग का समय एवं स्थान तथा उसकी निरंतरता का वैज्ञानिक परीक्षण किया जाना चाहिए। इसके साथ ही घटनास्थल से संबंधित CCTV फुटेज, तस्वीरें, मोबाइल रिकॉर्डिंग तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखना और आवश्यकतानुसार फोरेंसिक जांच कराना प्रकरण की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण हो सकता है।

WHRRC ने यह भी कहा कि मृतक की पहचान, मृत्यु की परिस्थितियां तथा शव की स्थिति का सत्यापन जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि संबंधित व्यक्ति की मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई, शव चिता तक किस प्रकार पहुंचा, कथित घटना किस समय और किन परिस्थितियों में हुई तथा क्या इसमें किसी अन्य व्यक्ति की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका थी। यदि जांच के दौरान किसी अन्य व्यक्ति की सहायता, उकसावे, साक्ष्य छिपाने अथवा अन्य आपराधिक भूमिका का तथ्य सामने आता है, तो उसका भी कानून के अनुसार परीक्षण किया जाना चाहिए।

परिषद् ने सामाजिक एवं धार्मिक दृष्टि से भी सावधानी बरतने की अपील की है। WHRRC के अनुसार, किसी एक व्यक्ति के कथित कृत्य के आधार पर पूरे किन्नर/ट्रांसजेंडर समुदाय, अघोरी परंपरा अथवा किसी अन्य धार्मिक या सामाजिक समुदाय के संबंध में सामान्यीकृत निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। भारत की विविध धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान आवश्यक है, लेकिन किसी भी व्यक्ति या परंपरा को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता। जांच का आधार केवल कथित कृत्य, उपलब्ध साक्ष्य और लागू कानून होना चाहिए।

इस घटना के संदर्भ में श्मशान स्थल की सुरक्षा एवं निवारक प्रशासनिक व्यवस्था भी महत्वपूर्ण विषय है। यदि घटना की पुष्टि होती है, तो यह भी देखा जाना आवश्यक होगा कि सार्वजनिक श्मशान स्थल पर शवों की सुरक्षा, प्रवेश नियंत्रण, निगरानी, CCTV व्यवस्था तथा अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाएं किस प्रकार संचालित हो रही थीं। यदि किसी स्तर पर व्यवस्था में कमी पाई जाती है, तो भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आवश्यक सुधारात्मक एवं निवारक कदम उठाए जाने चाहिए।

WHRRC का उद्देश्य मानवाधिकारों से संबंधित महत्वपूर्ण घटनाओं का तथ्यात्मक दस्तावेजीकरण, अनुसंधान एवं विश्लेषण करना तथा ऐसे मामलों से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर मानव गरिमा एवं अधिकारों की बेहतर सुरक्षा के लिए अध्ययन और सुझाव प्रस्तुत करना है। इसी उद्देश्य से परिषद् ने इस प्रकरण में पुलिस प्रशासन द्वारा की गई वास्तविक एवं प्रमाणित कार्रवाई का विवरण प्राप्त करने का निर्णय लिया है।

WHRRC की ओर से पुलिस अधीक्षक, जिला उज्जैन से अनुरोध किया गया है कि प्रकरण में अब तक की गई पुलिस कार्रवाई की एक विस्तृत तथ्यात्मक रिपोर्ट परिषद् को उपलब्ध कराई जाए। रिपोर्ट में, यदि FIR/Crime Number दर्ज किया गया है, तो उसका क्रमांक एवं दिनांक, संबंधित थाना, लागू धाराएं, आरोपी के विरुद्ध की गई कार्रवाई, गिरफ्तारी की स्थिति, जांच अधिकारी का पदनाम, घटनास्थल से प्राप्त प्रमुख साक्ष्यों का संक्षिप्त विवरण, CCTV अथवा डिजिटल साक्ष्यों की जांच की स्थिति, फोरेंसिक जांच की स्थिति तथा प्रकरण की वर्तमान जांच स्थिति का उल्लेख किया जाए।

परिषद् ने स्पष्ट किया है कि यदि जांच अभी जारी है, तो वर्तमान स्थिति के अनुरूप अब तक की गई प्रमुख कार्रवाई एवं उपलब्ध जानकारी साझा की जा सकती है। जांच पूर्ण होने के पश्चात अंतिम जांच निष्कर्ष एवं की गई वैधानिक कार्रवाई से संबंधित अद्यतन जानकारी भी परिषद् को उपलब्ध कराई जा सकती है।

WHRRC के अनुसार, ऐसी घटनाओं पर निष्पक्ष, वैज्ञानिक और कानूनसम्मत कार्रवाई केवल संबंधित प्रकरण में न्याय सुनिश्चित करने के लिए ही आवश्यक नहीं है, बल्कि इससे समाज में विधि के शासन, मानव गरिमा और न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास भी मजबूत होता है। साथ ही, ऐसी घटनाओं का तथ्यात्मक दस्तावेजीकरण भविष्य में शव-सुरक्षा, श्मशान स्थलों की प्रशासनिक व्यवस्था तथा मानव गरिमा की बेहतर सुरक्षा के लिए निवारक नीतियां विकसित करने में सहायक हो सकता है।

विश्व मानवाधिकार अनुसंधान परिषद् ने इस प्रकरण को “मानव गरिमा एवं मृत मानव शरीर के सम्मान से संबंधित गंभीर अनुसंधानात्मक विषय” के रूप में अपने अभिलेख में संज्ञानित किया है और पुलिस प्रशासन से विस्तृत तथ्यात्मक कार्रवाई रिपोर्ट उपलब्ध कराने की अपेक्षा व्यक्त की है, ताकि परिषद् घटना का मानवाधिकार, कानूनी एवं अनुसंधानात्मक दृष्टिकोण से निष्पक्ष अध्ययन कर सके।



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